जब भक्तों का कष्ट हरने स्वयं भक्तों के बीच आते हैं भगवान : जय जगन्नाथ

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न्यूज डेस्क, धनबाद : विश्व प्रसिद्ध भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था, भक्ति, प्रेम, समर्पण और मानवता की समानता का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह वह दिव्य अवसर है जब भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं और उन्हें दर्शन देकर उनका कल्याण करते हैं। यही कारण है कि रथयात्रा को केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के मिलन का महापर्व कहा जाता है। हर वर्ष ओडिशा के पवित्र तीर्थ पुरी धाम में आयोजित होने वाली यह विश्वविख्यात रथयात्रा देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों से श्रद्धालु इस दिव्य यात्रा के साक्षी बनने पुरी पहुंचते हैं। आस्था का ऐसा अद्भुत संगम विश्व में कहीं और देखने को नहीं मिलता। सालभर श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए श्रीमंदिर पहुंचते हैं, लेकिन रथयात्रा एकमात्र ऐसा अवसर होता है, जब भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच आते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ अपने मौसी घर गुंडिचा मंदिर की यात्रा पर निकलते हैं। पुरी की ऐतिहासिक बड़दांडा (ग्रैंड रोड) पर तीनों देवता अपने-अपने विशाल और भव्य लकड़ी के रथों पर विराजमान होकर नगर भ्रमण करते हैं। लाखों श्रद्धालु “जय जगन्नाथ” के जयघोष के साथ रथों की रस्सी खींचते हैं। ऐसी मान्यता है कि रथ की रस्सी खींचने वाले भक्तों को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और उनके जीवन के कष्ट दूर होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के अवतार श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा के दर्शन और रथ खींचने का पुण्य सौ अश्वमेध यज्ञों के बराबर माना गया है। ऐसा विश्वास है कि जो श्रद्धालु श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान के दर्शन करते हैं, उनके जीवन के दुख-दर्द दूर होते हैं और उन्हें सुख, समृद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुरी भारत के चार पवित्र धामों में से एक है। लगभग 800 वर्ष पुराने श्रीजगन्नाथ मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण, जगन्नाथ स्वरूप में विराजमान हैं। हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का पूर्णावतार माना गया है। उन्होंने गीता में कहा है कि जहां उनके भक्त प्रेम और भक्ति के साथ उनका स्मरण करते हैं, वहां वे स्वयं उपस्थित रहते हैं। यही संदेश रथयात्रा के माध्यम से जीवंत रूप में दिखाई देता है। जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि लगभग दस दिनों तक चलने वाला भव्य धार्मिक महोत्सव है। इसकी तैयारियां अक्षय तृतीया के दिन से ही शुरू हो जाती हैं, जब विशेष प्रकार की लकड़ियों से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों का निर्माण प्रारंभ होता है। पारंपरिक कारीगर पीढ़ियों से इस सेवा को निभाते आ रहे हैं। रथयात्रा के बाद भगवान गुंडिचा मंदिर में कुछ दिन विश्राम करते हैं और फिर बहुदा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। इस दौरान सुनाबेशा और अधरपाना जैसे विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी आयोजित किए जाते हैं, जिनका अपना अलग आध्यात्मिक महत्व है।

तीनों रथों का अपना विशेष महत्व :
भगवान जगन्नाथ का रथ ‘नंदीघोष’, भगवान बलभद्र का ‘तालध्वज’ तथा देवी सुभद्रा का ‘दर्पदलन’ कहलाता है। प्रत्येक रथ का रंग, आकार, ऊंचाई, पहियों की संख्या और ध्वज अलग-अलग होते हैं। हर वर्ष इन रथों का निर्माण नए सिरे से किया जाता है, जो भारतीय शिल्पकला और परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। रथयात्रा का सबसे बड़ा संदेश है कि भगवान के दरबार में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। जाति, धर्म, वर्ग और भाषा के भेदभाव से ऊपर उठकर लाखों लोग एक साथ भगवान का रथ खींचते हैं। यही कारण है कि इस पर्व को सामाजिक समरसता, भाईचारे और समानता का भी प्रतीक माना जाता है।

रथ का आध्यात्मिक अर्थ :
धार्मिक ग्रंथों में रथ को केवल लकड़ी का वाहन नहीं, बल्कि मानव जीवन का प्रतीक बताया गया है। शरीर रथ है, आत्मा भगवान जगन्नाथ हैं और बुद्धि उसका सारथी। जब तक आत्मा शरीर में रहती है, तब तक जीवन चलता है। इसी प्रकार भगवान के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता, बल्कि उसे आगे बढ़ाने के लिए लाखों भक्तों की सामूहिक शक्ति की आवश्यकता होती है। यह संदेश देता है कि समाज की प्रगति भी तभी संभव है, जब सभी लोग मिलकर एक दिशा में आगे बढ़ें। रथ की लकड़ी की सुगंध, शंख-घंटों की गूंज, वैदिक मंत्रोच्चार, हरिनाम संकीर्तन, धूप-अगरबत्ती की महक और “जय जगन्नाथ” के गगनभेदी उद्घोष पूरे पुरी धाम को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं। ऐसा लगता है मानो स्वयं भगवान अपने भक्तों का हाथ थामकर उन्हें जीवन की कठिन राहों पर आगे बढ़ने का आशीर्वाद दे रहे हों। इसीलिए कहा जाता है कि जब भक्तों के कष्ट हरने का समय आता है, तब भगवान स्वयं अपने सिंहासन से उतरकर भक्तों के बीच आते हैं और उनके कष्टों को हर लेते हैं।

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